पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग एक बड़े विरोधाभास में फंस गया है। आयोग ने खुद ही 29 मार्च को एक पुलिस अधिकारी को चुनाव संबंधी कार्यों से दूर रखने का आदेश दिया था। लेकिन महज 18 दिन बाद, 16 अप्रैल को जारी एक दूसरे आदेश में उसी अधिकारी को थाना प्रभारी बना दिया गया। इससे सवाल उठ रहे हैं कि आयोग अपने ही आदेशों के जाल में कैसे उलझ गया।
क्या है पूरा मामला?
मामला पश्चिम बंगाल में हो रहे विधानसभा चुनाव का है। चुनाव आयोग ने 15 मार्च को प्रेसनोट जारी करने के बाद पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले का दौर शुरू किया। इसी कड़ी में 29 मार्च को पुलिस के निरीक्षक और अवर निरीक्षक पद के अधिकारियों के तबादले का आदेश जारी हुआ। इस आदेश में एक खास अधिकारी को चुनाव संबंधित कार्यों से दूर रखने का निर्देश दिया गया था। मतलब साफ था कि उस अधिकारी को मतदान प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं दी जाएगी।
18 दिन में क्या बदल गया?
लेकिन 16 अप्रैल को चुनाव आयोग ने एक नया आदेश जारी किया। इस आदेश में उसी अधिकारी को थाना प्रभारी बना दिया गया, जिसे पहले चुनावी काम से दूर रखा गया था। थाना प्रभारी का पद चुनाव प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है, जिसमें कानून-व्यवस्था बनाए रखना और मतदान केंद्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल है। ऐसे में सवाल ये है कि 18 दिनों में ऐसा क्या हो गया कि जिस अधिकारी पर चुनाव आयोग को भरोसा नहीं था, उसे अब इतनी जिम्मेदारी दे दी गई।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या चुनाव आयोग के अपने ही दो आदेशों में साफ विरोधाभास है? क्या यह तबादला प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी का संकेत है? इस मामले ने चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
Hamaari Baat: आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल
Seedha baat karein toh यह मामला चुनाव आयोग की गंभीर लापरवाही दिखाता है। एक तरफ आप किसी अधिकारी को चुनावी ड्यूटी के लिए अयोग्य ठहराते हैं, और दूसरी तरफ उसे ही चुनाव की निगरानी की जिम्मेदारी दे देते हैं। यह सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि आयोग के अपने नियमों की अवहेलना है।
चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराना है। लेकिन ऐसे विरोधाभासी आदेश आम मतदाता के मन में शक पैदा करते हैं। अगर आयोग खुद अपने आदेशों का रिकॉर्ड नहीं रख सकता, तो वह पूरे चुनाव प्रक्रिया को कैसे संभालेगा? बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में, जहां हर चुनावी कदम पर नजर रहती है, ऐसी गलतियां बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। आयोग को तुरंत इस मामले की सफाई देनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करनी चाहिए, नहीं तो उसकी विश्वसनीयता दांव पर लग जाएगी।
Sources & References
- बंगाल चुनाव: EC का U-Turn — Vidrohi24