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India Apr 11, 2026 · min read

New Maithili Language Demand and Mithila State Movement in Jharkhand

झारखंड मैथिली मंच ने रांची में तीन दिन का 'विद्यापति स्मृति पर्व' आयोजित किया। इस दौरान मैथिली भाषा को दूसरी राजभाषा का दर्जा और Mithila Pradesh की मांग को दोहराया गया।

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New Maithili Language Demand and Mithila State Movement in Jharkhand
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TL;DR — Quick Summary

रांची के हरमू मैदान में झारखंड मैथिली मंच ने विद्यापति स्मृति पर्व का भव्य आयोजन किया। कार्यक्रम में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ मैथिली भाषा के अधिकारों और मिथिला प्रदेश की मांग को मजबूती से उठाया गया।

Key Facts
आयोजक
झारखंड मैथिली मंच
आयोजन स्थल
रांची का हरमू मैदान
कार्यक्रम
त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्व
मुख्य मांग
झारखंड में मैथिली को दूसरी राजभाषा का दर्जा
अन्य मांग
अलग मिथिला प्रदेश का गठन
उपस्थिति
बड़ी संख्या में मैथिल समाज के लोग

रांची में इस सप्ताह मिथिलांचल की संस्कृति की एक झलक देखने को मिली। झारखंड मैथिली मंच के तत्वावधान में हरमू मैदान में तीन दिन का 'विद्यापति स्मृति पर्व' आयोजित किया गया। यह सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि मैथिली भाषा और मिथिला प्रदेश की मांग के लिए एक मंच भी था। प्रभात खबर की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

विद्यापति स्मृति पर्व में क्या हुआ खास?

यह कार्यक्रम मध्यकालीन कवि विद्यापति की स्मृति में आयोजित किया गया। विद्यापति मैथिली संस्कृति और साहित्य के एक बड़े स्तंभ माने जाते हैं। कार्यक्रम के दूसरे दिन दो सत्र आयोजित किए गए। पहले सत्र में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुईं, जहां मैथिली गीत, नृत्य और कविता पाठ हुए। दूसरे सत्र में गंभीर चर्चा हुई। इस सत्र का मकसद साफ था: मैथिल समाज की मांगों को एकजुट आवाज देना।

सरकार से क्या मांगे गए अधिकार?

झारखंड मैथिली मंच के नेताओं ने इस मंच से राज्य सरकार के सामने दो बड़ी मांगें रखीं। पहली मांग झारखंड में मैथिली भाषा को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने की है। दूसरी मांग बिहार से अलग होकर एक अलग 'मिथिला प्रदेश' बनाने की पुरानी मांग को फिर से दोहराना है।

मंच के अध्यक्ष ने साफ कहा कि झारखंड में मैथिली बोलने वालों की एक बड़ी आबादी है। उनकी भाषा और संस्कृति को संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए। आज तक के अनुसार, मिथिलांचल क्षेत्र की पहचान और अधिकारों की मांग लंबे समय से चल रही है।

मिथिला प्रदेश की मांग का क्या है इतिहास?

अलग मिथिला प्रदेश की मांग कोई नई नहीं है। यह मांग दशकों पुरानी है। मिथिलांचल, जो मुख्य रूप से बिहार के उत्तरी जिलों और झारखंड के कुछ हिस्सों में फैला है, की एक अलग सांस्कृतिक और भाषाई पहचान है। यहां के लोग मैथिली बोलते हैं और अपनी विशिष्ट परंपराओं को मानते हैं।

इसकी एक झलक हाल ही में मिथिला पंचांग को लेकर चल रही चर्चा में भी देखने को मिली। जी न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मिथिला पंचांग के अनुसार त्योहारों की तारीखें अक्सर राष्ट्रीय पंचांग से अलग होती हैं, जो इसकी अलग पहचान को दर्शाता है। होली जैसे त्योहारों की तारीख को लेकर भी अलग मिथिला कैलेंडर होता है। एक और रिपोर्ट में बिहार में होली की तारीख को लेकर असमंजस की बात कही गई थी, जो दरअसल राष्ट्रीय और मिथिला पंचांग के अंतर के कारण होता है।

"हमारी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए राजभाषा का दर्जा जरूरी है। हम झारखंड सरकार से मैथिली को दूसरी राजभाषा घोषित करने की मांग करते हैं।" — झारखंड मैथिली मंच के एक नेता का कथन, प्रभात खबर के अनुसार।

मैथिली भाषा का आज क्या है हाल?

मैथिली भारत की 22 अनुसूचित भाषाओं में से एक है। इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में 2003 में शामिल किया गया था। फिर भी, इसके प्रचार-प्रसार और शिक्षा के माध्यम के रूप में इस्तेमाल को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। मैथिली बोलने वाले लोग झारखंड, बिहार और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रहते हैं। रांची जैसे शहरों में रोजगार की तलाश में आए मैथिल समुदाय के लोगों ने अपनी संस्कृति को जिंदा रखने के लिए ऐसे आयोजनों को महत्वपूर्ण माना है।

मिथिलांचल की अनूठी परंपराएं, जैसे ग्रहण के समय 'पाव' और 'सूतक' में रसोई बंद रखना, इसकी गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दिखाती हैं। जी न्यूज की एक रिपोर्ट में इन परंपराओं के बारे में विस्तार से बताया गया है।

हमारी बात: मांग जायज है, लेकिन रास्ता कठिन

सीधी बात कहें तो झारखंड मैथिली मंच की मांगें गलत नहीं हैं। किसी भाषा और संस्कृति को बचाने की लड़ाई जायज है। झारखंड में मैथिली बोलने वाले लोग हैं, और उनकी भाषा को आधिकारिक मान्यता मिलनी चाहिए। यह उनके अधिकार का सवाल है।

लेकिन, अलग मिथिला प्रदेश की मांग का रास्ता बहुत कठिन है। नए राज्य का गठन एक जटिल राजनीतिक प्रक्रिया है। इसमें संसद का बहुमत, राज्य विधानसभा की सिफारिश और गहरे सामाजिक-आर्थिक अध्ययन की जरूरत होती है। केवल सांस्कृतिक पहचान के आधार पर नया राज्य बनाना आसान नहीं होता। तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के गठन के पीछे भी लंबा आंदोलन और मजबूत प्रशासनिक तर्क थे।

हमारी नजर में, मैथिल समाज को पहला फोकस अपनी भाषा को बचाने और बढ़ावा देने पर रखना चाहिए। स्कूलों में मैथिली शिक्षा, स्थानीय प्रशासन में इसके इस्तेमाल और सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण पर काम किया जा सकता है। राजभाषा का दर्जा इस दिशा में एक बड़ा कदम होगा। अलग राज्य की मांग एक लंबी लड़ाई है, जिसके लिए व्यापक सहमति और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों की जरूरत है। रांची का यह आयोजन दिखाता है कि समुदाय अपनी पहचान के लिए जागरूक है। अब सवाल यह है कि सरकार इस आवाज को कितनी गंभीरता से लेती है।

Sources & References

  1. प्रभात खबर — प्रभात खबर, 52 मिनट पहले (अनुमानित)
  2. जी न्यूज — जी न्यूज, 1 महीना पहले
  3. जी न्यूज — जी न्यूज, 1 महीना पहले
  4. आज तक — आज तक, मिथिलांचल टॉपिक पेज
  5. जी न्यूज — जी न्यूज, 7 मार्च 2025
  6. NDTV Archives — एनडीटीवी आर्काइव, अक्टूबर 2025
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Written by

ISHRAFIL KHAN

Senior Reporter