बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का सफर कभी तूफानी रहा, लेकिन अब वो धीरे-धीरे अपनी जमीन खोती जा रही हैं। 1998 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली ममता ने कुछ ही सालों में बंगाल की मुख्य ताकत बनने का सफर तय किया। लेकिन 2019 से शुरू हुई गिरावट ने उनकी राजनीति को कमजोर कर दिया है। अब 2026 के चुनाव में उनकी आखिरी दुर्ग भी ढह गया है।
ममता बनर्जी का उदय और चरम
ममता बनर्जी ने 1998 में करीब 26 साल का कांग्रेस का नाता तोड़ा और तृणमूल कांग्रेस बनाई। [Original Story] के मुताबिक, तृणमूल ने 1998 में सात लोकसभा सीटों से शुरुआत की और एक साल बाद 1999 में आठ सीटें जीतकर मजबूत वापसी की। 2011 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर 184 सीटें जीतकर उन्होंने 34 साल पुराने वाम शासन को खत्म कर दिया। 2016 में 211 सीटों के साथ तृणमूल अपने चरम पर पहुंच गई।
2019 से शुरू हुई गिरावट
लेकिन 2019 में पहली बार बड़ी गिरावट का संकेत मिला। [Original Story] के अनुसार, 2021 में ममता की जमीन और खिसकने लगी। वोट शेयर का गणित बदल गया और क्षेत्रीय आधार टूटने लगा। एंटी-इनकंबेंसी यानी 15 साल की सत्ता का असर साफ दिखने लगा। संगठनात्मक कमजोरी और दलबदल ने पार्टी को और कमजोर किया। घोटाले और विवादों ने भी ममता की छवि को नुकसान पहुंचाया।
2026 में निर्णायक हार
अब 2026 के चुनाव में ममता बनर्जी को निर्णायक हार का सामना करना पड़ा है। [Original Story] के मुताबिक, उनकी आखिरी दुर्ग भी ढह गया है। वोट शेयर का गणित बताता है कि असली खेल यहीं हुआ। क्षेत्रीय आधार का टूटना, एंटी-इनकंबेंसी और घोटालों ने मिलकर ममता की राजनीति को कमजोर कर दिया है।
हमारी बात: ममता की राजनीति का अंत?
हमारी नज़र में, ममता बनर्जी की यह गिरावट सिर्फ एक चुनावी हार नहीं है। यह बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। 15 साल की सत्ता ने एंटी-इनकंबेंसी को जन्म दिया, जबकि घोटालों और दलबदल ने पार्टी को अंदर से कमजोर किया। ममता के लिए अब वापसी मुश्किल लगती है, लेकिन राजनीति में कुछ भी हो सकता है। बंगाल के वोटरों ने साफ संदेश दिया है कि बदलाव का समय आ गया है।
Sources & References
- Original Story — Vidrohi24