पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक बड़ा उलटफेर हुआ है। रानीगंज शहर मंडल के पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजेश मंडल ने आज, 11 अप्रैल 2026 को, भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और सीधे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। यह घटना अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुई है, जिससे इसका राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। प्रभात खबर ने सबसे पहले इसकी रिपोर्ट दी।
कौन हैं राजेश मंडल और क्यों है यह कदम अहम?
राजेश मंडल रानीगंज में भाजपा के एक कद्दावर और स्थानीय स्तर पर जमीनी नेता माने जाते हैं। वह पार्टी के शहर मंडल इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं। ऐसे नेता का चुनाव से पहले दल बदलना किसी भी पार्टी के लिए बड़ा झटका होता है। यूट्यूब पर उपलब्ध वीडियो रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह कदम स्थानीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। मंडल का स्थानीय नेटवर्क और समर्थन आधार अब टीएमसी के पक्ष में जा सकता है।
"अटल-आडवाणी वाली भाजपा अब नहीं रही"
भाजपा छोड़ने के बाद राजेश मंडल ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। फेसबुक पर शेयर की गई पोस्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि "अब अटल-आडवाणी वाली भाजपा नहीं रही।" यह बयान सीधे तौर पर पार्टी की वर्तमान कार्यशैली और संस्कृति पर सवाल उठाता है।
"अब अटल-आडवाणी वाली भाजपा नहीं रही।" — राजेश मंडल
इस एक वाक्य से दो बातें साफ होती हैं। पहली, मंडल पार्टी के मौजूदा नेतृत्व से नाखुश हैं। दूसरी, वह पार्टी की पुरानी विचारधारा और नेताओं को याद कर रहे हैं। यह कई पुराने कार्यकर्ताओं की भावनाओं से मेल खाता है।
2026 चुनाव पर क्या पड़ेगा असर?
रानीगंज, आसनसोल की एक अहम विधानसभा सीट है। यह कोयला खदानों का इलाका है और यहां की राजनीति बहुत गर्म रहती है। राजेश मंडल जैसे स्थानीय नेता के टीएमसी में जाने से चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।
- भाजपा को नुकसान: एक वरिष्ठ नेता और उनका समर्थक वोट बैंक खोना।
- टीएमसी को फायदा: स्थानीय जमीन पर मजबूती और भाजपा के वोटों में कटौती की संभावना।
- संदेश: अन्य असंतुष्ट नेताओं के लिए एक सिग्नल, जिससे और उलटफेर हो सकते हैं।
खासबात इंडिया के वीडियो में इस घटना को चुनावी राजनीति में एक बड़ा मोड़ बताया गया है।
हमारी बात: यह सिर्फ एक नेता का कदम नहीं, एक लक्षण है
सीधी बात कहें तो, राजेश मंडल का टीएमसी में जाना सिर्फ एक नेता का दल बदलना नहीं है। यह बंगाल की भाजपा के अंदर चल रही बेचैनी का एक स्पष्ट लक्षण है।
हमारी नजर में, इसके तीन बड़े मायने हैं। पहला, स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का पार्टी हाईकमान से मोहभंग हो रहा है। दूसरा, चुनाव से पहले टीएमसी सक्रियता से विरोधी पार्टी के नेताओं को अपने पक्ष में कर रही है, जो एक चालाक रणनीति है। तीसरा और सबसे अहम, "अटल-आडवाणी वाली भाजपा" जैसी टिप्पणी दर्शाती है कि पार्टी की पहचान और संस्कृति को लेकर अंदरूनी बहस अब सार्वजनिक हो रही है।
आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या यह एक अकेली घटना रहती है या फिर इससे एक श्रृंखला शुरू होती है। एक बात तय है, रानीगंज की सीट अब 2026 चुनाव में और ज्यादा दिलचस्प हो गई है।
Sources & References
- प्रभात खबर — प्रभात खबर, 11 अप्रैल 2026
- फेसबुक पोस्ट — प्रभात खबर (फेसबुक), 11 अप्रैल 2026
- इंस्टाग्राम पोस्ट — प्रभात खबर (इंस्टाग्राम), 11 अप्रैल 2026
- यूट्यूब वीडियो — यूट्यूब, 11 अप्रैल 2026
- खासबात इंडिया वीडियो — खासबात इंडिया (फेसबुक), 11 अप्रैल 2026